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मोक्ष होता है या नहीं, मुक्ति कैसे मिलें?

नमस्कार। एक प्रश्न है कि मोक्ष होता है या नहीं, मुक्ति होती है कि नहीं? लोग मोक्ष के पीछे पागल है, पागलों की तरह भटक रहे हैं, इधर से इधर। आध्यात्मिक में, लोग अपने घर-द्वार, बिजनेस, नौकरी सब छोड़-छाड़ के इधर-उधर भटक रहे हैं, जंगलों, पर्वतों पर, पहाड़ों पर। कुछ है भी कि नहीं? एक साधक का प्रश्न है यह। महाभारत पाठ, रामायण पाठ, भगवत पाठ होते जा रहे हैं। कोई है या बस यूहीं कुछ लोग आए और अपनी समझ से लिख दिए और ये रामायण, भगवत पाठ हो रहा है। कर्मकाण्ड बस किये जा रहे हैं। वास्तविकता क्या है? मोक्ष होता भी है क्या, कृपया आप मुझे समझाइये कि मोक्ष होता भी या नहीं?

देखिए, मैं आपको कहना चाहता हूँ कि मोक्ष उसके लिए है जिसके अंदर अभी बंधन है। अगर आपके अंदर कोई बंधन है तो आपके लिए कोई मोक्ष भी है, अगर आपके अंदर बंधन खत्म हो गया तो मोक्ष नहीं है। बात समझिएगा। बंधन क्या है, जैसे आपके भीतर कोई भी बंधन है जैसे कि मैं मर जाऊंगा या मर जाऊंगी, ये भी एक बंधन है? एक डर है, मृत्यु का डर है यानी कि एक बंधन है। इसका मतलब है कि मोक्ष भी है, मुक्ति भी है।

सरल तरीके से समझने की कोशिश करें। आपके शरीर में जब कोई बीमारी हो जाती है और जब बीमारी से आपको छुटकारा मिलता है तो आप क्या कहते हैं? चलो, मुझे बीमारी से मुक्ति मिली, मुझे बीमारी से छुटकारा मिला क्योंकि वह बीमारी आपके लिए बंधन थी। इसी प्रकार कोई गरीब है, जीवन में पैसों की जरूरत है और उनको पैसा मिल गया तो वह क्या कहते हैं? चलो, मुझे गरीबी से मुक्ति मिली, गरीबी से मुझे छुटकारा मिला, मुक्ति मिली, यानि कि मोक्ष मिला।

कोई व्यक्ति किसी कारणवश, किसी मामले में पुलिस केस में फंस जाता है और जेल में है, अब वह बंधन महसूस करता है। स्थूल जगत में समझने की कोशिश कीजिए। जब वह जेल से निकलता है तो कहता है कि मैं मुक्त हो गया, मुझे मुक्ति मिली, जेल से मुक्ति मिली। इसी प्रकार से आपके अंदर जो जीव है, वो भी तो बंधन में है, वो भी तो जेल में है। वह भी तो अपने कर्मों के, बहुत सारे कर्मों के बंधन में है। तो अब बंधन, कैसे बंधन?

आपके अंदर कोई दुख-सुख है, यह भी बंधन है। सुख भी बंधन है, सकारात्मक विचार यदि पकड़ कर रखा है तो वह भी बंधन है। नकारात्मक विचार कि मैं मर जाऊंगा, यह भी एक बंधन है। मुझे यह करना है, मुझे वह करना है, ये सब बंधन है। क्यों करना है क्योंकि तुम जेल में हो और जेल से निकलना चाहते हो, खुले आसमान में उड़ना चाहते हो इसीलिए तो तुम परेशान हो। कुछ कुछ करना चाहते हो। तुम्हें लगता है कि मैं बहुत सारा पैसा काम लूंगा तो मैं आजाद हो जाऊंगा। बहुत सारे सुख वैभव मुझे मिलेंगे और बहुत सारी स्त्रियों के साथ भोग विलास कर पाऊँगा। दुनिया की सैर करूँगा। बड़े-बड़े घर बनाऊँगा। मैं बड़ा आदमी बन जाऊँगा तो लोग मेरे हस्ताक्षर लेंगे। लोग मेरी जीवनी पढ़ेंगे। मेरे साथ फोटो खींचेंगे, हर जगह मेरी चर्चाएँ होगी। मैं टेलीविजन पर आऊँगा।

ये सब क्या है? आपके अंदर यह जो प्रवृत्ति है, यह सब क्या है? ऐसा करने की वृत्ति कहाँ से रही है? आपके अंदर क्या है जो ये सब करने के लिए फोर्स कर रहा है? असल में आपके अंदर कहीं ना कहीं बंधन है। इसलिए आप इन बंधनों से, इन बेड़ियों से मुक्त होना चाहते हैं, भौतिक जगत में लोग बंधन मुक्त कैसे होना चाहते हैं? भौतिक कामों के द्वारा, कोई बड़े ऑफिसर बनकर, कोई जज बनकर, कोई मिनिस्टर बन कर, कोई बड़ा राजनेता बनकर, अच्छे टीचर बनकर, अच्छे प्रोफेसर बनकर, अच्छे पति-अच्छी पत्नी बनकर।

आपके पास बहुत सारे सूत्र है, तरीके हैं जिसे कर-कर कर आप बंधन से मुक्त होना चाहते हैं। अगर मैं आप से पूछुं कि जो कुछ आप कर रहे हैं, उसकी क्या प्रेरणा है? आप वह क्यों कर रहे हैं? आपके अंदर कुछ तो प्रेरणा है, कोई मोटिवेशन रहा है, कहाँ से रहा है? असल में अन्दर जीव कुछ बंधन महसूस कर रहा है। वह बंधन में है, वह मुक्त होना चाहता है। जिस प्रकार कोई जेल में है तो उसकी मुक्ति हेतु उसके परिवार वाले कोर्ट में फाइल लगाते हैं। कोर्ट में केस चलता है, तारीख पर तारीख मिलती है। वह बंधन में है और सभी उसे निकालना चाहते है, वह भी निकलना चाहता है।

तो इसी तरह से जो जीव है, वह भी जेल में है, कौन सी जेल में है? इस शरीर रूपी संसार जेल में है, माया रूपी जेल में है, इस अहंकार रूपी जेल में है। आप चाहे सोने के महल में रहो या स्टील के महल में रहो या आप शीशे के महल में रहो या लोहे के महल में रहो या लोहे की जेल में रहो, स्टील की जेल में रहो, शीशे की जेल में रहो या सोने की जेल में रहो या चांदी की जेल में रहो, जेल तो जेल ही होता है, यह बंधन ही होता है।

कुछ करने का फोर्स, अंदर कुछ करने की प्रेरणा, एक वृत्ति, अन्तःप्रेरणा, एक एनर्जी आपको फोर्स कर रही है, क्यों? क्योंकि आप बंधन महसूस करते हैं, आप मुक्त होना चाहते हैं। इसलिए आप चिन्ताओं में फँसे हुए है, भूतकाल की चीजों को लेकर आपके मन में विचार चलते रहते हैं, भविष्य को लेकर चिन्ताएँ जाती है और चिन्ताएँ तो चिता के समान होती है। वर्तमान आपको कभी हाथ लगता ही नहीं है। तो इसी को कहा जाता है बंधन, समझ लेना है। जब तक आप बंधन में हो, आप मुक्त नहीं हो सकते, आकाश की भांति।

बाहर यह जो आकाश आपको दिख रहा है, यह भी भौतिकीय आकाश है। अगर हम अपनी आंखों से इसे देखते हैं, तो इसका भी दूर-दूर तक अंत नहीं मिलता है। यह आकाश भी सर्व व्याप्त है। इसी आकाश के अंदर सारे ब्रह्मांड की गतिविधियाँ चल रही है। अंतरिक्ष अनंत ब्रह्मांड है। ये सारी चीजें इसके अंदर ही काम कर रही है। आकाश जो है वह मुक्त है। आकाश में कोई बंधन नहीं है। आकाश मुक्त नहीं होना चाहता। आकाश तो स्थिर है। इसी प्रकार से, अगर आपके अंदर कोई भी बंधन है, यहाँ तक कि यह भी बंधन है कि मैं मर जाऊंगा। यदि ऐसा विचार आपके अन्दर गया, तो यह भी एक बंधन ही है।


जब तक अंदर बंधन है, कर्त्ता भाव है,

मैं बहुत काम कर रहा हूँ, मैंने उसकी हेल्प की, मैंने अपने परिवार वालों के लिए बहुत कुछ किया, मैं अपने धर्म के लिए बहुत कुछ करता हूँ, ये सब बंधन है। मैं करता हूँ यानी कि यह कर्त्ता भाव है। यह जो मैं है यह बताना चाह रहा है कि मैं यह करता हूँ, मैं यह करता हूँ, मैंने इतने श्रेष्ठ काम किये। मैंने समाज के लिए ये किए। ये जोमैंहै यह बताना चाहता है कि मैंने यह किया, वह किया। क्यों बताना चाहता है, क्योंकि भीतर कोई बंधन में है।

मैंअहंकार है, मैं एक भ्रम है, जो हम मैं कहते है वास्तव में वह है ही नहीं, अंहकारवश भ्रम ही है। और जो नहीं है, वह सत्य नहीं है, वह भ्रम है, उसको हमेशा डर लगा हुआ रहता है। किस बात का डर कि कहीं मेरी मृत्यु ना हो जांए, और जो सत्य है वह तो सदा से है। उसकी तो कोई मृत्यु और जन्म है ही नहीं। जबकि जो भ्रम है वही चिंतित रहता है। वह अंहकार है, वह ही चिंचित रहता है, तो यही है बंधन।

जब आप मुक्त हो जाओगे, तो आप एक परमात्मा रुपी, आत्मा रूपी, आध्यात्मिक आकाश की भांति हो जाएंगे जो सर्वत्र फैला हुआ है, वैसे मुक्त हो जाएंगे। यह आकाश नहीं, जिसे आपकी इन्द्रियाँ देख रही है। परमात्मा रुपी आकाश में समा जाओगे जिसका कोई आदि और अंत नहीं है। कहाँ से क्या शुरुआत हो रही है, कहाँ खत्म हो रही है, कुछ पता ही नहीं चलेगा। विलीन हो जाओगे उसमे। अभी तुम्हारा मैं तो भ्रम मात्र है। उस अनन्त में तुम रहोगे ही नहीं। वह अनन्त जो है वह ही रहेगा। तुम स्वयं अनन्त हो जाओंगे। स्वयं के स्वरूप में स्थित हो जाओंगे, शान्त-स्वरूप, आनन्द-स्वरूप और यह ही तुम्हारा स्वभाव है।

तो जब तक तुम्हारे अंदर बंधन है, कर्त्ता भाव है, मैं मर जाऊँगा जैसे विचार है, किन्हीं लोगों को लेकर आपके भीतर कोई शिकायत है तो ये सभी बंधन है। तब तक तुम्हारे लिए मोक्ष है। बंधन मिट गए तो मोक्ष मिल गया यानी कि अब तुम्हारे लिए कोई भी भेदभाव नहीं है, कोई भी तुलना नहीं है, तुम्हारे भीतर कुछ भी ऐसा कुछ नहीं है जिसे तुमने पकड़े रखा है तो तुम मुक्त हो। तुम्हें अगर पल सड़क पर भीख मांग कर भी खाना पड़ेगा, तब भी तुम उदास नहीं होंगे, तो तुम मुक्त हो।

तुम्हें कल कोई शूट करने वाला है, गोली मारने वाला हैं फिर भी तुम्हारे चेहरे पर मुस्कुराहट रहेगी जब तुम मुक्त हो जाते हो, क्योंकि तुम्हें अब शरीर से कोई लेना-देना नहीं, तुम तो उस अवस्था में पहुंच गए हो कि शरीर के बाहर-भीतर, अनंत रूप से, अनंत काल से, सदा-सदा से जो विद्यमान है, तुम तो उसके साथ हो गए और वो ही हो गए हो और वो ही हो तुम। अब इस शरीर में तेरे लिए क्या रखा है। अरे, है क्या इस गंदे शरीर में? मरने के बाद, एक दिन भी नहीं रखने वाले हैं तुम्हारे परिवार वाले, क्योंकि रखा क्या है इसमें? पानी हैं, मल-मूत्र हैं, माँस हैं, हड्डियों के खम्भें पर यह शरीर खड़ा है।

यदि कुछ है तो वह है साक्षी रूप में परम् चेतना जो इस शरीर में भी है और बाहर भी है, सर्वत्र व्याप्त है वह। तो हमें उसको जानना है। उसको जानना पड़ेगा। उसको जैसे ही जानोगे तो मिट जाओगे और मिट जाने के बाद तुम भी वही हो जाओगे। अब तुम्हारी जन्म-मृत्यु है ही नहीं। शरीर की मृत्यु से भी तुम्हें कुछ प्रभाव पड़ने वाला नहीं है क्योंकि तुमने मृत्यु को कभी का पा लिया है। जीते जी तुमने निर्वाण को पा लिया है। मोक्ष को, लिबरेशन को पा लिया है। अंत में इस शरीर की मृत्यु पर इसका भी डिजल्यूशन हो जायेगा और सब खत्म। तुम्हारे अन्दर यह भाव भी नहीं आएगा कि मैं फिर से जन्म लूंगा। यह भाव भी गया ना, तो तुम मुक्त नहीं हो।

तुम कैसे जन्म लोगे? कभी अपने आप से पूछा? क्या तुम हो भी? तुम हो ही नहीं, तुम कभी हुए ही नहीं, तुम तो ऐसे ही विचारों को पकड़ कर रखे हो, एक भ्रम है, एक अंहकार है जो कह रहा है कि मैं हूँ, मैं कैसे हो सकता है। यह मन कह रहा है कि मैं हूँ।

क्या बिना सागर के लहर हो सकती है? सागर के ऊपर लहर होने के लिए सागर को तो होना पड़ेगा ना? बिना सूर्य के किरणें हो सकती है क्या? किरणें होने के लिए सूर्य को होना पड़ता है। जल की एक बूंद होने के लिए जल को होना पड़ता है। तुम सागर की लहर, सूर्य की किरण, जल की बूंद, उस संकीर्णता को, तुच्छता को प्राप्त हो गए हो और उसे ही अपना असली रुप मान रहे हो।

 


अपने मूल स्वरूप का बोध ही मुक्ति है

जब यह सृष्टि बनती है, आत्मा प्योर कंससनेस होती है, चेतना प्योर रहती है, निर्लिप्त अवस्था में। जब वह सृष्टि के संसर्ग में, सत्, रजस और तमस इन तीनों रस के संसर्ग में आती है तो उस चेतना के ऊपर सत्, रजस, तमस का पहला लेप लग जाता है। उस लेप से बुद्धि तत्व उत्पन्न होता है। उस बुद्धि तत्व से फिर अहम्, अहंकार, अहम्-तत्व पैदा होता है।

बुद्धि-तत्व से अहम्-तत्व, अहंकार उत्पन्न होता है, और फिर उससे पांच ज्ञानेंद्रियां, पंचकमेंद्रियां, पंच-तन्मात्राएं, पंच महाभूत है, इस तरह से एक के बाद एक, एक के बाद एक बनते चले जाते हैं। जब जीवात्मा इस प्रकृति के तीनों गुणें के संसर्ग में आता है तो जीव आत्म भाव को प्राप्त कर लेता है। उसके अंदर बुद्धि-रूपी माया पहले आती है।

तुम्हारी बुद्धि जो है वह भी माया का ही खेल है। माया ने पहले ही उसे पकड़ रखा है, पहले ही पिंजरे में बंद कर दिया है। अतः तुम्हारी बुद्धि भी माया है इसलिए बुद्धि से तुम सत्य को नहीं जान पाओगे।

तो इस प्रकार पहले-पहले जब सृष्टि बन रही थी तो वह जो चेतना है, वह जैसे ही प्रकृति के तीन गुणों के संसर्ग में आई, तो उस चेतना पर जैसे ही इन तीनों का लेप लगता है, तो बुद्धि तत्व पहले उत्पन्न होता है और वह जीव को फंसा लेती है और बुद्धि के बाद फिर अन्य तत्व उत्पन्न होते चले जाते हैं, पंचकर्म-इंद्रिय, पंच-ज्ञान-इंद्रियां, पंच-तन्मात्राएं, पंच-महाभूत।

इस तरीके से ये सब उत्पन्न हो गए और सृष्टि बनती चली गई। सृष्टि में फिर और जानें और कितने प्रकार की अनेक शक्तियां, फिर एनर्जी उत्पन्न होती चली गई उसी के कारण आज आप इस सृष्टि में बैठ कर मुझे सुन रहे हो। वह जो जीव है, जो आत्मा है उसके ऊपर में लीपा-पोती होने के कारण, वह अपने मूल स्वरूप को भूल गया और जीव भाव प्राप्त कर लिया और उस जीव भाव प्राप्त करने की वजह से उसका सत्, रजस् और तमस् से बना उसका कारण शरीर समष्टि में जन्म-मृत्यु का सिलसिला चलने लगा। क्योंकि एक दाग लग गई ना, वह दाग जब तक खत्म नहीं होगा तब तक उसकी आगे जन्म-मृत्यु चलती रहेगी। जब तक वह बीज जलकर समाप्त नहीं होगा, जब तक वह बीज समाप्त नहीं होगा, तब तक प्रकृति में उसका आना-जाना लगा रहेगा।

जब भी आत्मा प्रकृति के तीन गुणों-सत, रजस एवं तमस के साथ एकत्व होती है तो जीव की सृष्टि होती है। अव्यक्त प्रकृति इस त्रिगुणात्मक शक्ति जब सर्वव्याप्त परमात्मा के प्रभाव में आती है तो अपने को व्यक्त करना आरम्भ करती है अर्थात् सृजन करना आरम्भ करती है। इसी प्रक्रिया में जीवात्मा का भी सृजन होता है जिसको विभिन्न कारणों से अपने मूल स्वरूप से पृथक हो जाने का भ्रम हो जाता है और वो अपने आपको एक पृथक सत्ता मानने लग जाती है जिससे उसकी विभिन्न गति की यात्रा आरम्भ हो जाती है और यह यात्रा तब तक जारी रहती है जब तक कि जीवात्मा अपने मूल स्वरूप को ना पा लें। इसको ही आत्म-बोध, आत्म-साक्षात्कार आदि नामों से जाना जाता है।

जिस दिन जीवात्मा को किसी सतगुरु से ब्रह्म ज्ञान मिल जाता है, या किन्हीं शास्त्रों के श्रवण से, कहीं से भी, किसी से भी मार्गदर्शन मिल जाता है, तो वह अंतर्मुखी होने लगता है। जब वह अंतर्मुखी होता है तो उसकी चेतना जो बाहर बह रही है, पंच-इंद्रियों के द्वारा, मन के द्वारा, जो चेतना बाहर बह रही है, वह अब भीतर बहना शुरू हो जाती है।

यह भौतिक जगत, माया जगत जीवात्मा को अपनी तरफ खींच कर रखता है। जीवात्मा की चेतना हमेशा बाहर की तरफ ही भागती है क्योंकि वह अपने नृत्य से हमेशा सबको अट्रैक्ट कर रही है, आकर्षित कर रही है और चेतना उसके पीछे भाग रही है।

जब कोई गुरु आकर कहता है कि भीतर की और जाओं, अंतर्मुखी हो जाओं। और जैसे ही साधक भीतर झांकता है,एक-एक स्टेप भीतर ऊतरता है तो उस पर हुई लीपा-पोती एक-एक स्टेप उतरती है, परत दर परत बंधन हटते चले जाते है और अंत में, जिस बुद्धि का उसके ऊपर लेप लगा हुआ था, वह बुद्धि रुपी लेप भी हट जाता है और वह अपने परम् स्वरूप में जाता है और तब वह देखता है कि मैं तुच्छता को प्राप्त हो गया था लेकिन मैं तो वह विराट स्वरूप हूँ। मेरा तो परम् आनंद स्वरूप है। सत्-चित्त-आनंद स्वरूप।

एक बार उधर पहुंचने के बाद, उसका बोध होने के बाद मुक्त हो जाते है। अब आपके लिए मृत्यु है, ना मोक्ष है, ना कोई धनी है, ना कोई गरीबी है, अब इस शरीर में आपके लिए कुछ नहीं रखा है।

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