कृष्ण की सुने वही अर्जुन, अज्ञानी मन का पुत्र तो दुर्याधन है
पौराणिक कथाएं प्रतीकात्मक कहानियाँ है जो परम सत्य को जानने के लिए आम आदमी को समझाने के लिए गढ़ी गई थी। लेकिन समस्या यह होती है कि हम पौराणिक कथाओं को सत्यापित करने में इस तरह से तत्पर हो जाते हैं, उलझ जाते हैं कि सत्य की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता है, हम सत्य के मार्ग पर चल ही नहीं पाते हैं।
पौराणिक कथाएं बस कथाएं हैं जो प्रतीकों के माध्यम से साधक को आत्म ज्ञान और ईश्वर की ओर प्रेरित करती है। प्रत्येक कथा का जो सार है, वह है ब्रह्म की ओर लेकर जाना। ब्रह्म यानी कि सत्य, सत्य की ओर लेकर जाना। सत्य यानी कि बंधनों को मिटाना।
मोक्ष है नहीं, रियल में कोई मोक्ष एग्जिस्ट नहीं करता है। जब तक आप एग्जिस्ट करते हो तब तक मोक्ष एग्जिस्ट करता है। जब तक आप है तब तक मोक्ष है। आप नहीं हो तो फिर मोक्ष भी नहीं है। दूसरे अर्थ में यदि मैं कहूं तो जब तक बंधन है तब तक मोक्ष है।
हर चीज में द्वैत या दो विपरीत धु्रव होते हैं, जैसे सुख-दुःख, बंधन-मुक्ति, मूलाधार-सहस्रार, स्त्री-पुरूष, दिन-रात, उत्तर-दक्षिण। तो मोक्ष भी ऐसे ही है। बंधन है तो उसके विपरीत एक ध्रुव मोक्ष है। बंधन नहीं है तो फिर मोक्ष भी नहीं है। जब दुख ही नहीं है, तो सुख की कौन सोचेगा। जब कोई बंधन ही नहीं है तो फिर मोक्ष भी कहां चाहिए।
मतलब आपके सारे बंधनों का मिटना ही मोक्ष है। बंधन है, तभी तक मोक्ष है। वास्तव में बंधन और मोक्ष दोनों ही मन की ही अवस्थाएँ है। जब तक मन को लगता है कि वह किसी बंधन में है, तब तक वह मोक्ष या मुक्ति पाने की इच्छा करता है, लेकिन आत्मा या चेतना तो कभी बंधी हुई थी ही नहीं, इसलिए मोक्ष भी कोई अलग से प्राप्त करने वाली वस्तु नहीं है।
तो बंधन को मिटाने के लिए ही सहस्रार के सारे तार खोलने पड़ते हैं। फिर बंधन मिटा तो मोक्ष भी मिटा। सहस्रार चक्र खुलने का अर्थ यह होता है कि साधक की चेतना पूर्ण रूप से जागृत हो जाती है और अज्ञान का पर्दा हट जाता है तो बंधन भी समाप्त हो जाता है, और जब बंधन ही नहीं रहता तो मोक्ष का विचार भी अपने आप समाप्त हो जाता है। उस अवस्था में केवल शुद्ध चेतना या सत्य का अनुभव रह जाता है, जहाँ न बंधन होता है और न मुक्ति, केवल स्वभाविक अस्तित्व रहता है।
आज मोक्ष पाने के चक्कर में कितने लोग डिप्रेशन में चले जाते हैं। कितने लोग काम-धंधा, नौकरी-व्यापार, धन-दौलत छोड़ कर भटक रहे हैं। किसको पाने के चक्कर में, मोक्ष को पाने के चक्कर में। सांसारिक जीवन से तो परेशान थे ही थे। बाद में किसी ने कहा इस परेशानी को दूर करने के लिए तुम्हें मोक्ष की प्राप्ति करनी पड़ेगी। अब मोक्ष की प्राप्ति के लिए फिर परेशानी। अब मोक्ष पाने के लिए चक्कर लगाने शुरू कर दिए।
मोक्ष प्राप्ति में क्या-क्या परेशानियां आती है, किसी का ध्यान घटित नहीं हो रहा है और यदि घटित हो गया तो कुण्डलिनी जागृत नहीं हो रही है, और हो गई तो कभी इस चक्र पर अटक गई, यहाँ अटक गई है, वह अटक गई है। ये सब प्रयास किसलिए, क्यों? क्योकि मोक्ष चाहिए। मोक्ष क्यों चाहिए? वहां क्या है? परम आनंद, परम शांति है।
जहां सत्य है, वहां परम आनन्द है, परम शांति है, जहां सत्य है वहां कोई बंधन नहीं। सत्य को तो मोक्ष नहीं चाहिए। सत्य कभी किसी बंधन में नहीं होता है। इसीलिए जब सत्य आता है तो उसके लिए ना मोक्ष है ना ही बंधन है। सो दैट्स व्हाई आई कॉल्ड दैट एज लॉन्ग एज यू एग्जिस्ट, यू मींस योर ईगो एग्जिस्ट, बंधन एंड मोक्ष आर देयर।
जब तक व्यक्ति का अहंकार या ‘मैं’ का अनुभव बना रहता है, तब तक उसे बंधन भी महसूस होता है और मोक्ष की इच्छा भी रहती है और इस प्रकार उसके लिए बंधन और मोक्ष दोनों का अस्तित्व है। लेकिन जब बंधन मिटा तो मोक्ष भी मिट गया। नहीं तो, मोक्ष की चाह, बंधन रह गया तो उस मोक्ष की प्राप्ति के लिए आप भागते रहोगे, भागते रहोगे।
हर एक मनुष्य की स्थिति अलग-अलग हो रखी है। तीन दिन तक मैं अपने शिविर में, सबसे पहले एनर्जी सिस्टम पर काम करता हूँ। जब मैं एनर्जी की बात कहता हूँ तो कई गुरु और उनके शिष्य मेरे विरोध में कहते हैं कि देखिए, आत्मज्ञान की बात करें और अब एनर्जी की बात कर रहे हैं। उनको यह पता नहीं कि जब तक एनर्जी ठीक नहीं होगी, जब तक सुषुम्ना नाड़ी के द्वारा प्राण प्रवाहित नहीं होंगे, तब तक सहस्रार नहीं खुलेगा और आत्मबोध नहीं होगा। यद्यपि यह भी आत्मबोध के मार्ग का एक पड़ाव ही है। बाद में यह अनुभव भी छूट जाता है।
लेकिन जब सुषुम्ना नाड़ी के द्वारा प्राण प्रवाहित होते हैं, तो सभी चक्र पार करते हुए प्राण उर्ध्वगामी होते हैं और सहस्रार खुलता है तो इससे सब कुछ कपाल से बाहर निकल जाता है, सब कुछ। जब तक वह पूर्णतया खाली नहीं हो जाता है, तब तक वह माया और कर्म के बंधन में रहता है। तो उस अवस्था तक ले जाने के लिए साधकों का सिस्टम ठीक करना पड़ता है। हमारे फर्स्ट लेवल के सेशन में, बहुत प्राणायाम करवाने पड़ते हैं।
मैं तो कहता हूँ कि एक बार, दो बार सेशन में कुछ नहीं होता है। क्योंकि बर्तन को आप जितने मांझोगे, उतनी चमक आती है और इसका अनुभव तो आप सब लोगों को है। आप में से कुछ साधक कई शिविरों में आए हैं, उनको यह अच्छे से पता होगा।
तो यहाँ शिविर में तीन दिन तक मुझे प्राणायाम के द्वारा, ध्यान के द्वारा, गायन के द्वारा, ध्वनियों के द्वारा आपके अंदर के पूरे के पूरे सिस्टम को यानी कि सूक्ष्म नाड़ियां को शुद्ध करना होता है। उसके भीतर जो गंदगी है, उस गंदगी को साफ करने के लिए, ब्लॉकेज को खोलने के लिए ये सब करना जरूरी होता है। कुछ ऊर्जा को मुक्त होना पड़ेगा। जब तक ऊर्जा बंधन में रहेगी, तब तक आपके अंदर कभी चिड़चिड़ापन, कभी अग्रेशन, कभी कुछ कभी कुछ होते रहेगा।
एनर्जी को ठीक करने के लिए, मुक्त करने के लिए हमें तीन दिन का समय चाहिए। ऐसा नहीं है कि तीन दिनों में सब के सब साधकों की एनर्जी ठीक हो जाती है, यह साधकों के स्तर पर निर्भर करता है। कुछ बहुत आगे निकल जाते हैं, कुछ लोगां की कुछ स्तर तक बढ़ती है व आगे की साधना शुरू होती है और जो पहले से ठीक करके आते हैं वो बहुत गहरे चले जाते हैं। जो नहीं करके आते हैं, उनकी यहां से यात्रा शुरू होती है और बहुत तेज मतलब स्पीड में शुरू हो जाती है।
शिविर के प्रथम तीन दिनों के भीतर कभी-कभी कुछ साधकों का भागने का मन होता है। एक्चुअली भागने का मन किसका होता है? अपने भीतर जो अनेक प्रकार की ऊर्जाएं निर्मित हो चुकी है, उन ऊर्जाओं को ही मैं फैकल्टीज कहता हूँ। जो नेगेटिव फैकल्टीज में है, वो भागना चाहती है।
आसुरी और दैविक फैकल्टीज प्रकृति में विद्यमान है। पहले मैं आपको फैकल्टी का थोड़ा सा मतलब बता दूँ। जैसे आपके भीतर गुस्सा है। यह गुस्सा एक फैकल्टी है। ईर्ष्या है, यह एक फैकल्टी है। आसुरी वृत्तियाँ जैसे द्वेष, किसी से नफरत ये नेगेटिव फैकल्टीज है। दूसरों से तुलना कर रहे हैं, ये भी एक फैकल्टी है। चिंता और भय भी फैकल्टी है। बुद्धों के लिए कुछ नकारात्मक और सकारात्मक नहीं होता है। वे हर परिस्थति में सम है, निर्मल है, निर्मूल है।
आप देखिए, आपके भीतर का सिस्टम किस प्रकार से गड़बड़ा जाता है। इम्यून सिस्टम तक गड़बड़ा जाता है। यदि आपकी जिंदगी में भय चार दिन तक एग्ज़िस्ट कर लिया, तो आपके पूरे एनर्जी सिस्टम को बिगाड़ कर रख देगा। बिज़नेस को भी ख़राब कर देगा। क्योंकि आप भय की फ्रीक्वेंसी में होते हैं। भय की फ्रीक्वेंसी यानी कि नकारात्मक ऊर्जाओं की फ्रीक्वेंसी में। जब नकारात्मक ऊर्जाओं के प्रभाव में आ जाते हैं तो सृष्टि की जितनी भी नकारात्मक ऊर्जाएं हैं, वे सभी क्रमशः एक के बाद एक आपकी जिंदगी में घटित होना शुरू हो जाती है। आपको समझ में नहीं आता है कि मेरे साथ यह क्या हो रहा हैै। असल में आपने ही उनको इन्वाइट किया है, भयभीत होकर। इतनी पॉवरफुल है ये सारी फैकल्टीज।
इस प्रकार समाज में तमाम नकारात्मक ऊर्जाएं, आसुरिक प्रवृत्तियां दैविक प्रवृतियों से युद्ध कर रही है, लड़ रही है। उनके बीच प्रतिस्पर्धा चल रही है। विजय प्राप्त करने के लिए प्रत्येक वृत्तियों की प्रतिस्पर्धा, उसकी विपरीत वाली वृत्तियों से होती है। आपको लगता है कि बाहर मनुष्य लड़ रहे हैं, नहीं। मनुष्य के हाथ, पैर, आंख और कान के भीतर झांक कर देखो, कौन लड़ रहा है? सूक्ष्म जगत लड़ रहा है। सूक्ष्म जगत की लड़ाई हो रही है।
जैसे मेरी आवाज इस कैमरे में रिकॉर्ड हो रही है। कैमरा स्थूल है लेकिन मेरी आवाज सूक्ष्म रूप से रिकॉर्ड हो रही है। यहां मैं माइक पर बोल रहा हूँ और यह जाकर उस कैमरे में रिकॉर्ड हो रही है। इसी तरह से हमारा यह स्थूल शरीर है, लेकिन इसके भीतर सूक्ष्म जगत है, लड़ाई झगड़ा वहां चल रहा है, जो हमें बाहर दिखाई दे रहा है। तो सूक्ष्म रूप से आसुरी सम्पदाएँ या आसुरी वृत्तियां, जिसे पुराणों में दैत्य या राक्षस कहा गया है, समाज में हर जगह, हर डिपार्टमेंट में आपको देखने को मिलेगी।
दैविक सम्पदाएं क्या है? प्रेम, करुणा, क्रोध विहीनता, सहनशीलता, सहिष्णुता, लोभ विहीनता, जीवों पर दया, असहाय को सहारा देने की वृत्ति, एकांतता, धैर्य-शक्ति, सहन-शक्ति, आत्म-संयम, सेवा करने की शक्ति, समता, समभाव, समदृष्टि, निर्णय लेने की शक्ति आदि ये सब क्या है? आपके भीतर फैकल्टीज है कि नहीं? ये फैकल्टीज क्या है? सकारात्मक प्रवृत्तियाँ कहते हैं हम। ये सब दैविक सम्पदाएँ है, दैविक गुण है।
जब तक मनुष्य में दैविक गुण जागृत नहीं होंगे, तब तक कुंडलिनी ऊपर नहीं आती है, कुंडलिनी शक्ति यानी ऊर्जा सुषुम्ना नाड़ी से प्रवाहित होकर मूलाधार से सहस्रार तक गति नहीं करेगी।
सम्पूर्ण श्रीमद् भगवत गीता इसी पर आधारित है। दैविक और आसुरी शक्तियों के बारे में बताती है। दो प्रकार की प्रवृत्तियांँ जो एक दूसरे के विपरीत लड़ रही हैं। हजारों वर्ष पहले ऋषि बता कर गये लेकिन समस्या बस यह है कि हम पौराणिक कथाओं को सत्यापित करने में इस तरह से तत्पर हैं, उलझे हुए हैं कि सत्य की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता है, हम सत्य के मार्ग पर चल ही नहीं पाते हैं।
दैविक और आसुरी शक्तियां इसी क्षण लड़ रही है, आपके भीतर लड़ रही है। कुरूक्षेत्र बाहर कहीं नहीं है, हमारे भीतर ही कुरूक्षेत्र है, जहां हर समय दैविक और आसुरी प्रवृत्तियाँ में युद्ध चलता है। समाज में हर जगह यही कौरव और पांडव है। तो कौरवों को हराने के लिए पांडवों की सेना को मजबूत होनी पड़ेगा। और पांडव कब जीतेंगे? जब उनके साथ कोई कृष्ण होंगे, तभी वह जीत पाएंगे।
जब तक आसुरी प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त नहीं करेंगे, तब तक पांडव स्वर्ग की ओर नहीं पधारेंगे। तो पहले तो भीतर की आसुरी प्रवृत्तियों को हराना है। इनको हराएंगे, तभी ऊर्जा ऊपर आएगी। अपने अंदर के कौरवों को पहचान कर उन पर विजय पाना है। महाभारत का युद्ध केवल इतिहास नहीं है, बल्कि मनुष्य के अंदर चलने वाले युद्ध का प्रतीक है।
जो ज्ञान ले रहा है, जो अपनी सिचुएशन में, समस्याओं में बंधा हुआ है, जो अनुरागी है, जो ज्ञान को ले रहा है, जो इस संसार में फंस गया है लेकिन जिसे संसार से विरक्ति हो गई है कि अब मुझे निकलना है, कैसे निकले, इसके बारे में मुझे जानना है, वही अर्जुन है। वह फंसा हुआ है, निकलना चाहता है, इसलिए ज्ञान का श्रवण करता है, वह श्रोता है, वहीं अर्जुन हैं और हर व्यक्ति अपनी जगह पर वहीं अर्जुन है।
लेकिन अर्जुन कब है, जब वह कृष्ण के संग है, जब वह कृष्ण की वाणी सुन रहा है तो वह अर्जुन है। यदि कोई कृष्ण के संग नहीं है तो वह अर्जुन नहीं है, तो फिर वह कौन है? फिर वह दुर्योधन है, अज्ञान से ढके हुए मन (अंधा मन अर्थात् धृतराष्ट्र) का पुत्र दुर्योधन है। अज्ञान से ही दुर्योधन जैसी प्रवृत्तियाँ पैदा होती है।
मोह, अज्ञान से ढके हुए अंधे मन का पुत्र दुर्योधन है, और धृतराष्ट्र कौन है? अज्ञान से ढका हुआ मन धृतराष्ट्र है। संस्कृत में धृत का मतलब पकड़े रहना, थाम के रखना, किसको? मन किसको पकड़ कर रखता है, मन इंद्रियों और उसके साम्राज्य को पकड़ कर रखता है, इंद्रियों का साम्राज्य अर्थात् राष्ट्र। इंद्रियों पर कौन शासन करता है, मन करता है, तो अज्ञान से ढका हुआ इंद्रियासक्त मन कौन है धृतराष्ट्र।
जब मनुष्य को यह पता होता है कि कोई कार्य गलत है, फिर भी वह अहंकार, लोभ और जिद के कारण उसे छोड़ना नहीं चाहता है, वही दुर्योधन की प्रवृत्ति हैं अर्थात् सत्य को जानकर भी जो स्वीकार नहीं करें वहीं दुर्योधन है। जिसे दैविक ऊर्जाएं पंसद नहीं है, वह उन्हें कहता है, दूर हटो।
जब साधक इस प्रवृत्ति पर विजय पा लेता है, तभी उसके भीतर के पाण्डवों यानी दैविक गुणों की विजय होती है, जो उसे आगे चलकर सत्य का बोध कराते हैं।अहंरत सेवा फाउण्डेशन लोगों के शारीरिकए मानसिक,
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