पंच इंद्रियों से संबंधित कुछ ध्यान विधियाँ
‘‘हमारी पंच इंद्रियों से संबंधित कुछ भी ध्यान बनाया जा सकता है। मन से संबंधित ध्यान बनाया जा सकता है, श्वांस से संबंधित ध्यान बनाया जा सकता है, भाव से संबंधित ध्यान बनाया जा सकता है। तो हम अपनी ही ध्यान विधि बना सकते हैं। नाम तो कुछ भी दे दो। शब्दों में अटकना नहीं है। ‘‘
ट्रान्सेंडैंटल मेडिटेशन भी आपको यहीं तक लाता है यानी कि आपको अपनी अहम वृत्ति से ट्रांसेंड करता है, ऊपर उठाता है।ट्रान्सेंडैंटल मेडिटेशन में एक मंत्र दिया जाता है। उस मंत्र को अंदर ही अंदर चांटिंग करना होता है, पुनरावृति करनी पड़ती है, उस मंत्र का जाप करना होता है। जिसका मन बहुत कमजोर होता है, उन लोगों के लिए मंत्र ठीक रहता है, चांटिंग करते-करते, वे ध्यान में चले जाते हैं।
आपको एक बात हमेशा ध्यान में रखनी है, जिंदगी में चाहे जितना भी मंत्र जप कर लेना, ध्यान-तपस्या कर लेना लेकिन जीवित गुरु, जिसने स्वयं आत्म-साक्षात्कार किया है, उसके पास जाने और उसका आशीर्वाद प्राप्त करने की कोशिश करना, क्योंकि वह स्वयं सारे शास्त्रों का सार होता है। उसका एक आशीर्वाद, उसकी एक दृष्टि आपको गति दे देगी। आगे अगर कुछ बड़ी घटना आपके जीवन में घटित ना भी हो, लेकिन आप सत्य के काफी निकट पहुँच जाओगे।
जब कोई एक जीवित, पूर्ण गुरु आता है तो उसके सानिध्य में हजारों-हजारों लोग उपलब्ध हो जाते हैं। यह बात हमेशा याद रखना है। जब गुरु का शरीर ना रहा तो किसी और जीवित गुरु जो पूर्ण गुरु है, उसके पास जाना चाहिए, बैठना चाहिए, समय बिताना चाहिए, तो अपने आप ब्लेसिंग प्राप्त होगी। सच्चे गुरु की वाणी और आशीर्वाद खाली नहीं जाता है। यह सूक्ष्म जगत की बातें है। सच्चे और पूर्ण गुरु का आशीर्वाद आपको गति देगा। लेकिन गुरु पूर्ण होना चाहिए। वैसे तो आपको बहुत सारे गुरु मिल जायेंगे, आपको ध्यान दे देंगे, विधि दे देंगे, ध्यान करवा भी देंगे लेकिन जो चीज आत्मप्रज्ञ गुरु के पास है, उससे आप चूक जायेंगे।
देखिए, हमारी पंच इंद्रियों से संबंधित कुछ भी ध्यान बनाया जा सकता है। मन से संबंधित ध्यान बनाया जा सकता है, श्वांस से संबंधित ध्यान बनाया जा सकता है, भाव से संबंधित ध्यान बनाया जा सकता है। इस प्रकार, हम अपनी ही ध्यान विधि बना सकते हैं। नाम तो कुछ भी दे दो। शब्दों में अटकना नहीं है। श्वांस के आवागमन को देखना, उसके प्रति अवयेरनेस को रखना, अजपा जाप कहा जाता है। विपासना और आनापान ध्यान विधि को कुछ बुद्ध की विधि कहते है लेकिन यह तो बुद्ध के पहले से ही प्रचलित है। इसी प्रकार श्वांस जब अंदर जाता है तो ‘सो‘ और छोड़ते हैं तो ‘हम‘ तो फिर ‘सोहम्‘ बन जाता है। इसलिए कुछ लोगों ने ‘सोहम विधि‘ बना दी और इसी पर ध्यान करवा रहे है, सो..हम..., सो..हम...। ये श्वांस भी बता रही है आपको कि आप यह शरीर नहीं है, आप वही परमात्मा हो इसलिए इसको छोड़ दो और इससे परे निकल जाओ।
जैसे कि मैंने ऊपर कहा कि हम हमारी पंच इंद्रियों से संबंधित कुछ भी ध्यान बना सकते है। अब आँख खोल कर एक वृक्ष को एक टक होकर देखो, एक पत्थर को एक टक होकर देखो, एक फूल के निरन्तर देखो। सभी ध्यान में तीन चीजें है, एक फूल या कोई वस्तु या चिन्ह जिसे देखा जा रहा है, दूसरा देखने वाला और तीसरी देखने की प्रक्रिया। खुली आँखों से भी देखते-देखते, देखते-देखते समाधि में जा सकते है जहां ये तीनों विलुप्त हो जाते है। तो इस प्रकार, आप अपनी एक ध्यान विधि बना सकते है। ध्यान का मतलब ही है मन को किसी पर टिकाना, चाहे खुली आँखों से टिकाए, बंद आँखों से आँखों से टिकाए, श्वांस पर टिकाए या मंत्र जप पर टिकाए या अपने हृदय की धड़कन पर टिकाए या सोकर सिलिंग के पॉइंट पर टिकाए या भीतर कल्पना करके किसी मूर्ति या गुरु की मूर्ति पर, कृष्ण-शिवा की मूर्ति पर टिकाए, कहीं भी टिकाए। यह आपको निर्धारित करना है कि जहां आपका मन स्थिर हो जाए, डगमागए नहीं। आप ऐसा कुछ ढूंढ लो जहां पर आसानी से आपका मन टिक जाएं, वहां पर अपने मन को टिकाना है।
जब आप किसी पर अपना मन टिकाते हो तो वह धारणा हो गई। धारणा दे रहे हैं, धारणा दे रहे, लेकिन अंदर विचार तो चल ही रहे है लेकिन धारणा जारी है। हो सकता है, एक महीना, दो महीना, साल, दस साल या पन्द्रह साल से धारणा दे रहे हो, लेकिन ध्यान नहीं घटा तो इसका मतलब है कि आप ध्यान नहीं कर रहे हो, धारणा ही कर रहे हो। धारणा ही चल रही है। जिस दिन एक विचार पर मन टिक जाएगा, एक वृत्ति पर मन स्थिर हो जाएगा या एक वस्तु पर मन टिक जाएगा, उस दिन ध्यान घटेगा।
और यदि आप उसी एक विचार, एक वृत्ति, एक वस्तु पर टिके रहे, टिके रहे, टिके रहे तो अचानक से वह विचार भी खत्म हो जाएगा, तो ध्येय वस्तु में समाधि लग जाएगी। इसलिए ध्येय वस्तु किसी को भी बना सकते है, मन को बनाइए, उसके पीछे-पीछे जाइए, साक्षी भाव से देखिए। श्वांस को बनाइए या खुली आँखों से बाहर दिखने वाली किसी भी चीज को ध्येय बनाइए। कोई नाद की ध्वनि को ध्येय बना लिजिए। नदी की खल-खल की आवाज को ध्येय वस्तु बना लिजिए। म्यूजिक को बना लिजिए। कुछ भी बना सकते हैं।
शास्त्रों में क्या लिखा है, हमें नहीं पता। ठीक है, लिखा होगा; लेकिन हम तो यहां बैठे लोगों की मनोवृति, उनके स्वभाव के अनुसार विधि बताते है, उस पर बात करते है। उसके अनुसार बात करते हैं। शास्त्रों में ऐसा लिखा है तो हमे ऐसा ही करना पड़ेगा, वो जमाना गया। समय के अनुसार चेतना विकसित होती है, दुनिया विकसित होती है और बहुत सारी चीजें विकसित होती है सिवाय एक शिव के।
तो गुरु कभी भी, साधक के स्वभाव के अनुसार ध्यान विधि डेवलप करके उसे दे देता है। सिद्ध गुरु के लिए जरूरत नहीं कि शास्त्रों में लिखा, तो वह वही करेगा। कृष्ण ने भगवत् गीता में कहा कि नाक के सिरे पर ध्यान टिकाओ। तो जरूरी नहीं कि सभी वहीं करें। सभी का स्वभाव एक सा नहीं होता है, इसी प्रकार एक विधि सभी के लिए कारगर नहीं होती है। एक और ध्यान की विधि होती है श्रवण विधि। आप जो ध्यानपूर्वक मुझे सुन रहे है तो यह भी एक ध्यान की ही विधि है। इस विधि में सुनने पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है। इसमें बिना किसी विचार या विश्लेषण के सुना जाता है।
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