ध्यान आरम्भ कैसे करें?
"जब हृदय शुद्ध होता है, भीतर पवित्रता होती है, सात्विक दृष्टि होती है तब धीरे-धीरे आप स्वयं के करीब आने लगते हैं और एक दिन उस सत्य का, परमात्मा का प्राकट्य होता है। परमात्मा के प्रकटीकरण के लिए, आपके हृदय का शुद्धिकरण बहुत जरूरी है। अगर आपके चित्त में गंदगी है तो कभी भी वह परमात्मा आपमें प्रकट नहीं हो सकता है।"
नमस्कार। एक साधक का प्रश्न है कि ध्यान आरंभ कैसे करें? देखिए, ध्यान आरम्भ करने के लिए कई बातों को समझना जरूरी है। पहले ध्यान का ध्येय जानना जरूरी है कि आपके ध्यान का ध्येय क्या है? यदि आपके ध्यान का ध्येय मुक्ति, मोक्ष, सत्य या आत्मा को जानना है तो यह अति सुंदर है। अगर आपके ध्यान ध्येय पैसा कमाना है, बिजनेस का विस्तार करना है, बीमारियों को ठीक करना है तो यह अलग मार्ग है जो एक अलग दिशा की ओर जाता है। इसकी एक अलग गति हो जाएगी। ध्यान शुरु करने के लिए, पहला पॉइंट, मैं यह कहना चाहता हूँ कि आप किसी गुरु के पास जाए। किसी गुरु से सीखें। प्रत्यक्ष गुरु के पास जाकर ध्यान करें। यदि हो सकता है तो गुरु से दीक्षा भी ले लें। गुरु अपनी ब्लेसिंग देकर, आपको ध्यान में आगे बढ़ायेगा। आपको यह भी बता देगा कि तुम्हें कौनसी विधि से ध्यान करना चाहिए, कब और कैसे करना चाहिए। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि गुरु साधक का निरीक्षण करता है, उसके चित्त को, उसके स्वभाव को देखता है, उसकी इंक्वारी करता है, पूछताछ करता है, इन्वेस्टिगेशन करता है कि यह साधक किस मार्ग से, पूर्व जन्म में साधना करते हुए आया है। इसी आधार पर गुरु तय करता है कि इसको मंत्र साधना दूँ या कोई जप साधना दूँ या श्वांस पर ध्यान करने के लिए दूँ या शांभवी मुद्रा का ध्यान करने के लिए दूँ। इस प्रकार गुरु उस पर दो चार विधियाँ आजमा कर उसके लिए उपयुक्त विधि तलाश लेगा, जिसके साथ वह शीघ्र कनेक्ट होता है और उसी विधि से उसे ध्यान करने के लिए कहेगा जिससे वे शीघ्र मुक्ति की राह पर आगे बढ सकें।
अगर आपको प्रत्यक्ष कोई गुरु मिलता है या आप उनके पास नहीं जा पा रहे है लेकिन आप ध्यान शुरू करना चाहते है तो आप यूट्यूब वीडियो देखकर भी ध्यान शुरू कर सकते है। ध्यान शुरू करने से पहले कई बातें अपने दिमाग में बिठा कर रखने की जरूरत है। मैं आपको सीधे यह नहीं बताऊँगा कि आप ऐसा करो या वैसा करो, श्वांस पर ध्यान दों या कोई मंत्र जप करो या थर्ड आई पर ध्यान करो तो आपका ध्यान लगने लग जायेगा। ध्यान शुरू करने के लिए मैं ऐसी कोई सलाह नहीं दूंगा। ध्यान में डूबने के लिए, आँखें बंद करके पूरी दुनिया में, हिमालय से लेकर, जंगलों, कंदराओं में बहुत सारे लोग बैठे हुए है। लेकिन ध्यान करने के लिए बहुत सारी बातों का ध्यान रखना भी जरूरी है। बहुत सारे गुरु और गुरु मां है जो अध्यात्म की यात्रा में भी मीट, मांस मछली का सेवन करते हैं और अपने साधकों को भी करवाते हैं और ध्यान करने के लिए भी कहते हैं। हमारे मार्ग में ऐसा नहीं है। मैं कहूंगा कि ध्यान में आने के लिए, मीट-मांस तो क्यो तामसिक आहार भी नहीं लेना चाहिए। सात्विक आहार लेने की कोशिश करें। एक बार में तो आप छोड़ नहीं पायेंगे, धीरे-धीरे अपने भोजन को बदलें, सात्विक आहार में बदलें।
तामसिक और राजसिक आहार से मन बहुत चंचल रहता है। यदि आप तामसिक या राजसिक आहार लेते हैं और आप ध्यान करना चाहते है तो आप चाहे किसी भी विधि से ध्यान करें, मन बहुत चंचल रहेगा और आप ध्यान नहीं कर पायेंगे। जबकि ध्यान का मतलब ही है मन को एकाग्र करना, अपने चित्त को एकाग्र करना, किसी एक चीज पर एकाग्र करना। किसी मंत्र पर अथवा श्वांस पर एकाग्र करना। मंत्र चांटिंग से भी मन को नियन्त्रित किया जा सकता है। मंत्र से मन को पकड़ लिया जाता है और मन को मंत्र में घुमाया-फिराया जाता है। मंत्र जपते-जपते मन खत्म हो जाता है और मंत्र ही बच जाता है और मंत्र का उच्चारण करते-करते धीरे-धीरे मन विलीन होने लगता है और एक ऐसा समय आता है जब वह मंत्र भी छूट जाता है और हम परम ध्यान में उतर जाते हैं, उस परम ध्यान में आपकी समाधि भी लग सकती है, आपके सारे चक्र खुल सकते है, कुडलिनी शक्ति जागृत हो सकती है। समाधि लग सकती है, परमात्मा और आत्मा का साक्षात्कार हो सकता है। मुक्ति मिल सकती है।
इस प्रकार मंत्र भी मन को नियन्त्रित करने के लिए ही है। यदि आप श्वांस पर अच्छे से एकाग्र हो सकते है तो आप श्वांस पर ध्यान कीजिए। विज्ञान भैरव तंत्र में श्वांस से संबंधित नौ विधियों के बारे में बताया है। पहली विधि है, जिसमें आप श्वांस के आवागमन पर अपना ध्यान केंद्रित कर सकते हैं कि श्वांस मेरे अंदर आ रही है, फिर महसूस करें कि श्वांस पेट में नाभि के एक इंच नीचे तक जा रही है, फिर श्वांस वहां से मुड़कर बाहर आ रही है। बुद्ध ने इसे आनापानसति नाम दिया है जिसमें श्वांस के आवागमन पर ध्यान देना होता है। यह ध्यान आप हर समय कर सकते है, कहीं पर बैठकर कर सकते हैं। आप इस प्रकार भी ध्यान शुरू कर सकते है।
लेकिन ध्यान शुरू करने के लिए कई बातों का ध्यान रखना पड़ता है, नहीं तो आप ध्यान शुरू नहीं कर पाएंगे; जैसे कि किसी निश्चित आसन में लम्बे समय तक बैठने का अभ्यास। आपको किसी एक आसन में निरन्तर बैठने का अभ्यास करना पड़ेगा। किसी एक आसन को सिद्ध करना पड़ेगा, चाहे वह सिद्धासन हो, सुखासन हो या पद्मासन हो या और कोई अन्य आसन भी हो सकता है। तो आपको एक आसन को सिद्ध करना पड़ेगा जिसमें आप चुपचाप कम से कम बीस मिनट से आधा-एक घंटा तक शरीर को बिना हिलाए-डुलाए बैठे रह सकते है। शुरू-शुरू में कम से कम दस से पन्द्रह मिनट तक बैठने का अभ्यास करें। यदि एक आसन आपने सिद्ध कर लिया, जिसमें आप बिना हलचल लगातार बैठे रह सकते है, तो भी उस आसन की सिद्धि से आपका ध्यान लग जायेगा।
आसन सिद्ध करने के बाद, ध्यान में जाने से पहले आपको कुछ प्राणायाम करने चाहिए। कई प्रकार के प्राणायाम है, उन प्राणायाम को करिए। ऑनलाइन और ऑफलाईन सेशन में, मैं हमेशा ध्यान से पहले कई पॉवरफुल प्राणायाम करवाता हूँ। आप भी उन प्राणायाम को कर सकते है। यदि आप ये नहीं कर सकते तो आप सिम्पल भस्त्रिका करें या अनुलोम विलोम करें या रेचक पूरक कुंभक करें। रेचक, पूरक और कुम्भक बहुत ज्यादा करें। ये आपकी कुण्डलिनी जागृत होने में भी सहायक है। बैठते ही तुरन्त प्राणायाम शुरू नहीं करें। प्राणायाम से पहले आप थोड़ी फिजिकल एक्सरसाइज करें। अपने शरीर को थकाए। जॉगिंग करें, योग करें या कुछ भी फिजिकल एक्टिविटी करें जिससे आपका शरीर थक जाए। थक जाने से क्या होगा कि आपके शरीर के अंदर ऑक्सीजन की मात्रा भी बढ़ जाती है। क्योंकि नॉर्मल ब्रीदिंग से हमारे शरीर के अंदर लगभग पांच सौ एम.एल. से एक हजार एम.एल. ऑक्सीजन ही रहता है। लेकिन जब हम फिजिकल एक्टिविटी करते हैं और प्राणायाम कर लेते हैं तो साइंटिफिकली इट इंक्रीजेज ससटेन्सियली बिटविन पांच हजार एम.एल. टू दस हजार एम.एल। इतनी हमारे शरीर में ऑक्सीजन बढ़ जाती है तो हमारा शरीर भी ऊर्जावान हो जाता है।
यदि हमारे शरीर में ऊर्जा बढ़ी हुई होगी तो यह हमारे ध्यान के लिए अच्छा रहेगा। जब हम ध्यान करते हैं तो एकाग्रता भी बढ़ती है और हमारे अंदर और अधिक ऊर्जा फॉर्म होती है। ऊर्जा बढ़ानी आवश्यक है, चाहे मंत्र से बढ़े या ध्यान से। उस ऊर्जा से ही हम ब्रह्मांड की महा ऊर्जा के साथ संबंध स्थापित करते हैं और फिर उस महा ऊर्जा से परे स्थित न्यूट्रल में, परमात्मा के साथ, शिवा के साथ एक हो जाते हैं, जहां पर आपको मुक्ति मिल जाती है। आप फिर परमात्मा को जानकर खुद परमात्मा ही हो जाते हैं। परमात्मा को जान लेने से, परमात्मा के साथ होना होता है। यह बात हमेशा रहेगी अर्थात् द स्टेट ऑफ नॉईंग एण्ड द स्टेट ऑफ बिंग, हमेशा रहता है। द स्टेट ऑफ नॉईंग, यह द्वैत के मार्ग पर होता है और द स्टेट ऑफ बिंग, यह अद्वैत में होता है, परमात्मा की स्थिति में होता है। परमात्मा प्राप्ति के पश्चात् सिर्फ होना होता है, वहां कुछ जानना नहीं होता है।
तो ध्यान शुरू करने से पहले, मैंने क्या-क्या बातें बताई, फिजिकल एक्टिविटी, योग या एक्सरसाइज करना, उसके बाद प्राणायाम करना। कोई एक आसन को सिद्ध करना जिसमें कम से कम पन्द्रह से बीस मिनट, धीरे-धीरे बढ़ाते-बढ़ाते आधा-एक घंटा तक बैठने का प्रयास करना। उसके बाद धीरे-धीरे अपने आप ध्यान लगने लग जायेगा, सिर्फ बैठेंगे तो भी। महर्षि रमन कहते है कि सुखासन, सिद्धासन, पद्मासन में निरन्तर बैठ भी जाओ तो भी आपका ध्यान लगने लग जायेगा। उस फिजियोलॉजी में बैठने मात्र से आपका ध्यान लगने जग जायेगा। अविचल बैठने मात्र से आपका मन नियन्त्रित होने लगता है और आप धीरे-धीरे ध्यान में चले जाते हैं।
यदि कोई निश्चित ध्यान की विधि ही अपनाना चाहते हैं तो आप अपनी श्वांस पर अपना ध्यान केन्द्रित कर सकते है, अपने आज्ञा चक्र पर भी ध्यान कर सकते है। यदि आप अच्छा रिजल्ट चाहते हैं तो किसी गुरु से प्रत्यक्ष जाकर उसकी ब्लेसिंग ले, उनसे शक्तिपात दीक्षा भी ले ले, तो बहुत तेजी से आप आगे बढ़ेंगे; क्योंकि गुरु का आशीर्वाद बहुत महत्त्व रखता है क्योकि वह ब्रह्म में लीन रहता है । वह अपनी एनर्जी आपके अंदर स्थापित कर देता है। वह एनर्जी, आपके ध्यान को बहुत तीव्रता के साथ आगे लेकर जाती है।
इस तरीके से आप ध्यान की शुरुआत कर सकते है। अब बात करते हैं खानपान की। ध्यान शुरू करने वाले साधक को अपने खानपान पर भी विशेष ध्यान देना होगा। आपको सात्विक आहार ही लेना चाहिए। यदि आप राजसिक और तामसिक भोजन का सेवन करेंगे तो इससे मन चंचल रहेगा। जबकि ध्यान का सारा खेल मन की एकाग्रता का है कि मन को हम कैसे एकाग्र करें। किसी भी एक ध्येय पर मन को हमे एकाग्र करना है। हम मन को एकाग्र करने का प्रयास करते हैं जबकि मन तो हमारी पंच इंद्रियों के द्वारा, पंच इन्द्रियों के विषयों में विचरण करता है। ध्यान में हम हमारे मन को, इंद्रियों के पंच विषयों से, बाहर से खींचकर अपने अंदर समेटते हैं, अपने अंदर लाते हैं। इंद्रियों के विषयों से खींचकर, जब मन को वापस लाया जाता है, चेतन को वापस भीतर लाया जाता है, तो अंदर उसको कोई न कोई धारणा देनी पड़ती है, ध्येय देना पड़ता है जिस पर मन को ध्यान करना पड़ता है। जब हम उस ध्येय पर ध्यान करते हैं, चित्त को एकाग्र करते हैं तो धीरे-धीरे अपने आप ध्यान में आगे बढ़ने लगते हैं। एकाग्र करने का मतलब क्या है कि जब आप एक ही पॉइंट पर ध्यान दे रहे हैं, आपके विचार बहुत कम होने लगते हैं और धीरे-धीरे विचार रहित की अवस्था आने लगती है।
जब आप ध्यान शुरू करते हैं तो तीन चीजें होती है, एक आप, एक ध्येय और तीसरी ध्यान की प्रक्रिया लेकिन अंतिम समय जब आता है ये तीनों गायब हो जाते हैं और परम आकाश में आपको फैंक दिया जाता है, जहां महाशून्य है, एम्पटीनेस है। उसे आप समाधि की अवस्था समझ सकते हैं। तो इस तरीके से आप ध्यान में आगे बढ़ सकते हैं और ध्यान शुरू कर सकते हैं । तो हमेशा ध्यान रखें कि मुझे सात्विक आहार लेना है।
ध्यान करने के लिए कोई नियमित समय अगर आप निर्धारित कर लेते हैं तो आपके लिए बेहतर साबित हो सकता हैं। सुबह और शाम दो टाइम ध्यान करेंगे तो बहुत अच्छा है। कम से कम पन्द्रह से बीस मिनट या तीस मिनट तक बैठे रहने की कोशिश करें, समय निकालें, समय तो मिलता नहीं है, सब व्यस्त होते हैं और व्यस्तता का मूल कारण है कि आपका मन बहुत व्यस्त है, यानी कि बहुत सारी चीजों को लेकर मन चिंतन मनन कर रहा है, ओवर थिंकिंग हो रही है। तो ध्यान का मतलब भी ओवर थिंकिंग या बहुत सारे जो विचार चल रहे हैं, उन विचारों को कम करना ही होता है; क्योंकि विचारों से ही आपको मुक्ति चाहिए, मन से मुक्ति चाहिए और मन को ही मुक्ति चाहिए। तो समय तो निकालना ही पड़ेगा आपको। आप समय निकालकर, आराम से कहीं बैठ कर, ध्यान कर सकते है। चलते फिरते हुए भी आप अपनी श्वांस पर ध्यान कर सकते हैं।
आप हर समय साक्षी ध्यान कर सकते हैं। साक्षी ध्यान का मतलब है कि आप अपने आंतरिक जगत के प्रति होश पूर्वक रहे कि आंतरिक जगत क्या है, आपके मन में कौन से विचार चल रहे हैं, उन विचारों के प्रति अवेयर हो जाए, आपके दिल की धड़कन के प्रति हो जागरूक हो जाए, अपनी श्वांस के आवागमन को निरंतर देखते रहे। किसी ने आपको कुछ कह दिया, किसी ने कुछ बातें आपको कही और उन बातों का असर आपके अंदर क्या हो रहा है, उसको भी आप साक्षी बनकर देखें। किसी ने गाली दी, तो उस गाली का आपके अंदर क्या प्रभाव पड़ रहा है, उसको भी देखें। आपका हृदय किन्ही बातों से व्याकुल हो रहा है, उसे भी देखें। भय उत्पन्न हो रहा है, उसे भी देखें यानी कि आंतरिक जगत में जो कुछ भी घटित हो रहा है, उन चीजों के प्रति अवेयरनेस, होश में रहे, चौबिस घण्टे, तो यह भी ध्यान है।
आप जब बिस्तर पर सोने जा रहे हैं, तो भी श्वांस पर ध्यान लाएं, श्वांस पर ध्यान केंद्रित करें तो यह भी ध्यान है। ध्यान की बहुत सारी विधियां है। विज्ञान भैरव तंत्र में एक सौ बारह विधियां बताई गई है, एक सौ बारह विधियां यहां एक्सप्लेन करना संभव नहीं है और सबके लिए सभी विधियां नहीं होती है। जो लोग ध्यान शुरू करना चाहते हैं, उनके लिए मैं आज बस बेसिक बातें कर रहा हूँ, नहीं तो मैं डायरेक्ट परमात्मा प्राप्ति की बात करता हूँ, डायरेक्ट जागरण की बात करता हूँ, आत्मानुभूति की बात करता हूँ, कुण्डलिनी जागरण या समाधि की बातें करता हूँ। आज बिगनर्स के लिए मैंने बहुत बातें बताई है, उनके अनुसार वे ध्यान की शुरूआत कर सकते हैं।
ध्यान करके मुक्त होना, सत्य को जानना, स्वयं को जानना ही आपके जीवन के दुःखों का निवारण है। जीवन में दुःख है, यह भी एक सत्य है। बुद्ध ने पहले ही बता दिया था कि इन दुःखों से कैसे मुक्त होना है। देखिए, ध्यान करते-करते जब हम अपनी स्वरूप तक आते हैं तो हम प्रकृति से भी ऊपर चले जाते हैं, यानी कि सत, रजस और तमस, इसे हम ब्रह्मा, विष्णु, महेश या इलेक्ट्रॉन, प्रोटोन, न्यूट्रॉन या कोई भी तीन त्रिगुणात्मक गुण आप समझ सकते हैं। जिन त्रिगुणात्मक गुणों से यह पूरा ब्रह्मांड बन रहा है, चल रहा है और खत्म हो रहा है। प्रकृति के ये तीन मूल अव्यक्त गुण है। प्रकृति इन तीनों अव्यक्त गुणों से चलती है। प्रकृति भी अनादि है, स्वरूप बदलता रहता है, पहले अव्यक्त स्थिति में होती है फिर व्यक्त स्थिति में आती है और यह चक्र चलता रहता है।
जो इन तीणों से परे चले जाते हैं, उसे हम परमात्मा कहते है, शिवा कहते हैं, कृष्णा कहते हैं, आत्मा कहते हैं, या सत्य कहते हैं। जो सत्य तीनों काल में विद्यमान है, जब यह सृष्टि रहती है तब भी विद्यमान है, सृष्टि नहीं रहती है तब भी विद्यमान है और जब यह सृष्टि नहीं होगी तो भी विद्यमान है। हमेशा-हमेशा से वह विद्यमान है। उसको ही हम कालों का काल महाकाल या देवों के देव महादेव शिवा कहते हैं और वह स्वरूप आपका ही है। लेकिन यह अनुभूति जब तक नहीं होगी तब तक आप उस अवस्था तक नहीं पहुंचोगे।
ध्यान हो या मंत्र जप हो या कर्म योग हो या भक्ति योग हो, कोई भी आध्यात्मिक प्रयास हो, ये सब सफाई के माध्यम है, इन सब से आपके अंदर जो अहम् वृत्ति है, चित के अंदर जो गंदगी है, ये सभी उनको साफ करती हैं। अगर आपके हृदय का शुद्धिकरण ना हो, पवित्रता न हो तो यह संभव नहीं होगा।
जब हृदय शुद्ध होता है, भीतर पवित्रता होती है, सात्विक दृष्टि होती है तब धीरे-धीरे आप स्वयं के करीब आने लगते हैं और एक दिन उस सत्य का, परमात्मा का प्राकट्य होता है। परमात्मा के प्रकटीकरण के लिए, आपके हृदय का शुद्धिकरण बहुत जरूरी है। अगर आपके चित्त में गंदगी है तो कभी भी वह परमात्मा आपमें प्रकट नहीं हो सकता है।
परमात्मा तो कण-कण में व्याप्त ही है, लेकिन आपको इसकी अनुभूति नहीं है क्योंकि आपके चित्त में, आपके अंदर अभी गंदगी है। अगर आपके अंदर काम है, द्वेष है, क्रोध है, क्लेश है, मानसिक द्वंद है तो परमात्मा की प्राप्ति मुश्किल है। द्वेष भी कई प्रकार के होते है, सभी द्वेष बाधाएं है। चाहे वे राजसिक द्वेष हो, चाहे सात्विक द्वेष हो, तामसिक द्वेष हो या चाहे वे सकारात्मक या नकारात्मक द्वेष, सारे द्वेष खत्म होने पड़ते है, तभी हृदय शुद्ध होने लगता है। चित्त सात्विक वृत्ति में आ जाता है और सात्विक वृत्ति से धीरे-धीरे हम एकाग्र होने लगते हैं, ध्यान में आगे बढ़ने लगते हैं, और अंत में यह चित्त भी विलीन हो जाता है।
आपको एक बात समझना बहुत जरूरी है कि जब आप ध्यान में आगे बढ़ेंगे और आगे जाकर समाधिस्थ होंगे तो समाधिस्थ होने के बाद भी कई महिनों तक, कई सालों तक आपके जीवन में कुछ संस्कार, पूर्व संस्कार और प्रारब्ध घटित होते रहेंगे। उदाहरणतः जैसे एक पंखा चल रहा है, तेजी से चल रहा है और आपने स्विच ऑफ कर दिया। आपने स्विच ऑफ तो कर दिया लेकिन आपके स्विच ऑफ करने के बावजूद भी वो पंखा कुछ समय अपनी गति में चलता ही रहेगा, तीस सैकण्ड से एक-दो मिनट तक, उसकी स्पीड की गति अनुसार।
इसी प्रकार जब कोई योगी परामात्मा का अनुभव कर लेता है और मै‘पन खत्म हो जाता है, अहम वृत्ति खत्म हो जाती है, मैं का डिजॉल हो जाता है, इंफिनिटी कंसिसनेस में, तब भी उसके अंदर कुछ संस्कार बाकी रहते है इसलिए आत्म साक्षात्कार के बाद, मैं का एकाएक डिजोलेशन नहीं होता है, धीरे-धीरे होता है। जैसे मैंने फेन का स्वीच ऑफ कर दिया फिर भी फेन कुछ समय चल ही रहा है। इसी प्रकार वह एकात्म की स्थिति में तो आ जाता है, एकत्व को तो जान लेता है, सृष्टि के साथ एक हो गया, समाधिस्थ भी हो गया, निर्विकल्प समाधि में भी चला गया फिर भी उसके कुछ पूर्व संस्कारों तो रहते ही है जिनका धीरे-धीरे-धीरे निरोध होता है। इस दौरान कुछ घटनाएं घटित होती जायेगी। हो सकता है, कुछ बूरी घटनाएं भी घटित हो; क्योंकि उसे प्रारब्ध बहुत ही फास्ट स्पीड में कन्ज्यूम होते हैं। जैसे गाड़ी स्पीड में चल रही है, पांच नंबर गियर में, फूल स्पीड में, डेढ सौ, दो सौ या तीन सौ की स्पीड में और अचानक आप गाड़ी को न्यूट्रल करते हैं तो वो गाड़ी बहुत दूर तक जाती रहेगी, बिना ब्रेक के चलती रहेगी।
इसी प्रकार से आपने तो अनुभूति कर ली, फिर भी आपके जो पूर्व कर्म है वे संस्कार धीरे-धीरे खत्म होते हैं, निरोध होते हैं। इसीलिए साधक को छ महीना, एक साल, दो साल, तीन साल, चार साल या किसी-किसी को इससे भी ज्यादा समय लग सकता है, पूर्ण निरोध अवस्था में आने के लिए, परम शुद्ध चैतन्य अवस्था में आने के लिए।
तो ये सारी चीजें मैंने आपके साथ शेयर की। आप इन बातों को ध्यान में रखकर अपना ध्यान शुरू कर सकते हैं, मंत्र से, जप से शुरू कर सकते हैं, श्वांस पर भी ध्यान शुरू कर सकते हैं। ध्यान शुरू करने से पहले ध्यातव्य बातें और आसान ध्यान विधियां मैंने आपके सामने रखी। आप इनके अनुसार ध्यान शुरू कर सकते है। आप कोई मंत्र जप भी कर सकते हैं, आप श्वांस पर भी ध्यान कर सकते हैं, साक्षी ध्यान भी कर सकते हैं और होश पर भी ध्यान साध सकते हैं। मैंने कई बातें बताई, लेकिन सिर्फ ध्यान करने बैठना ही काफी नहीं है।
जिस प्रकार एक बेबी बड़ा होता है तो उसके सभी अंग यकायक विकसित नहीं होते, उसकी आंखें, नाक, कान, हाथ पांव धीरे-धीरे विकसित होते हैं; ऐसा नहीं है कि पहले उसके हाथ ही बड़े होते है या पहले केवल सिर ही बड़ा होता है, सभी अंग एक साथ और धीरे-धीरे विकसित होते हैं। इसी प्रकार से अगर पतंजलि के मार्ग के अनुसार समझाया जाएं, जो अष्टांग मार्ग है यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। तो ये आठों अंग साथ-साथ डेवलप होते हैं। ऐसा नहीं है कि एक-एक डेवलप होता है। जब कोई साधना मार्ग में होता है, तो उसमें ये आठों अंग धीरे-धीरे, साथ-साथ डेवलप होते हैं और अंत में वह समाधिस्थ हो जाता है। इसी प्रकार से, ध्यान मार्ग में ध्यान, आसन, खान-पान, ध्यान की अवधि, आपके अंदर सात्विक वृत्तियाँ, ये सारी चीजें साथ-साथ, धीरे-धीरे, धीरे-धीरे डेवलप होगी। यदि आप साधना में आगे बढ़ना चाहते हैं तो आपको इन सभी चीजों की नियमित प्रैक्टिस करनी है, इन बातों का ध्यान रखना है, पालन करना है।
यदि आप राक्षस की तरह तामसिक भोजन डाले ही जायेंगे, डाले ही जायेंगे तो ध्यान में कैसे आगे बढ़ेगे। दिन में बार-बार, असमय सात्विक भोजन करने से भी वह अंदर जाकर तमस ही पैदा करेगा। इससे मन चंचल रहेगा तो हम ध्यान में कैसे आगे बढ़ेंगे। हमारी चेतना का विकास ही नहीं होगा। तामसिक भोजन से तामसिक चेतना और राजसिक भोजन से राजसिक चेतना का विकास होगा। हमें सात्विक भोजन व विचार ग्रहण करने है जो सात्विक चेतना विकसित करेगा, जो आत्मा की ओर लायेगा, स्वयं के करीब लायेगा।
इसलिए आपको इन सारी चीजों को ध्यान में रखना है और साथ-साथ विकसित करना है। यदि ऐसा कोई चलता है तो एक दिन वह परम पिता परमेश्वर के साथ एक हो जाता है और योगसिद्धि, आत्मसिद्धि, परमात्मा सिद्धि प्राप्त कर लेते है और वहां पर सिर्फ आप होते हैं, आपके सिवाय और कोई नहीं होता है। जब तक आपके सिवाय कोई और है तो यह द्वन्द्ध है। भगवान को पाने के लिए, जब आपकी सारी इच्छाएं खत्म हो जाती है, जब आप सबकुछ खो देते हैं, आपके सारे कर्मकाण्ड भी समाप्त हो जाते हैं, पूजा-पाठ भी खत्म हो जाती है, आप अकेले बच जाते हैं, तब भगवान की प्राप्ति होती है, आत्म-साक्षात्कार होता है। धन्यवाद।
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